शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

उक्ति - 5

एक मनुष्‍य लोकतान्त्रिक नियमों-कानूनों की जानकारी न रखने के बावजूद भी जीवन-पर्यन्‍त देश हित में समुचित बना रहता है तथा एक मनुष्‍य लोकतन्‍त्र का नेतृत्‍व करते हुए नियमों-कानूनों को बनाता है और उनके उल्‍लंघन का प्रतिनिधित्‍व भी करता है। क्‍या हमें ऐसा लोकतन्‍त्र चाहिए?

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