सोमवार, 2 दिसंबर 2013

उक्ति - 24

अपराध एक व्‍यक्ति करता है और अपराध निरोध कानून सबके लिए बन जाता है। जो व्‍यक्ति जीवनभर किसी वाद-विवाद तक में नहीं पड़ा हो वो अपने ऊपर अपराधरोधी कानून और इसकी चाही-अनचाही प्रक्रियाओं का बोझ कैसे सह सकता है? क्‍या लोकतन्‍त्र में ऐसा होना चाहिए?


9 टिप्‍पणियां:

  1. अपराध और भूल-चूक में तो अंतर होना ही चाहिए-
    सादर

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  2. शुक्रिया आपकी टिप्पणियों का समाज सापेक्ष लेखन का आपके।

    मौज़ू सवाल उठाया है आपने।

    क़ानून से होता भी क्या है नैतिक आचरण हो आम औ ख़ास का तो बात बने।

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  3. लोकतंत्र में ऐसी व्यवस्था तो जरुर होनी चाहिए .....

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  4. शायद अपराध को रोखना सबसे पहले जरूरी है ... चाहे क़ानून बनाने से या वैसे ...

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  5. लेकिन इस के अलावा और चारा भी क्या है..लेकिन जांच एजेंसी और न्याय व्यवस्था को इसे लागू करने में निष्पक्ष और समस्त परिस्थितियों पर ध्यान रखना ज़रूरी है..

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  6. अभिव्यक्ति का शिखर छू रही है ये रचना। शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया !

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  7. बहुत खूब अभिव्यक्त किया अपने विचारों को हुज़ूर | शानदार

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  8. हाँ शक के दायरे में हरेक व्यक्ति आ जाता है। जनता का जनता के लिए जनता द्वारा शापित तंत्र है यह बुद्धि मंदों का तंत्र।

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  9. अगर वह खुद अपराधी नहीं है तो मस्त रहे अगर अपराधी है तो दायरे में रहे !!

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